शिक्षा
का उद्देश्य - आइनो को खिड़कियों में बदलना
गुरु
गोबिंद दोऊ खड़े, का के लागूं पाय।
बलिहारी
गुरु आपणे, गोबिंद दियो बताय!!
संत कबीरदास का यह दोहा
गुरु और शिक्षा के महत्व को समझाने का सबसे उपयुक्त
माध्यम है, लेख की दिशा इसी दोहे से प्रत्यक्ष हो चुकी है ,बस इसे
प्रमाणित करना शेष है , खड़ी बोली में आईने को 'शीशा' कहा जाता है , वह कांच
से बना होता है शायद इसीलिए, पर मेरा तात्पर्य उस कांच से नहीं
है जो खिड़की -दरवाजों आदि में लगता है ,बल्कि उस दर्पण से है जिसमें आप अपना
चेहरा देखते हैं , उधर खिड़की से भी मेरा अभिप्राय उस तंग गली की तरफ लगी खिड़की से
नहीं है जो गली के इस ओर लगी हो और जिसके सामने गली के उस
ओर ऊँची दिवार हो ,जो महज़ नाम की खिड़की हो काम की नहीं , बल्कि
मेरा अभिप्राय ऊँची अट्टारी पर लगी उस खिड़की से है , जिससे धरती से लेकर आसमान
तक पूरा जहां देखा जा सकता है !
शिक्षित एवं अशिक्षित
व्यक्ति में वही अंतर होता है जो आईने के सम्मुख खड़े व्यक्ति और खिड़की के
सम्मुख खड़े व्यक्ति में होता है इसलिए अनपढ़ व्यक्ति को 'कूपमंडूक' की
संज्ञा भी दी जाती है , अर्थात जिसकी दुनिया अपने चारों तरफ
निश्चित दायरे तक ही सीमित रहती हो , जबकि शिक्षित व्यक्ति की
समझ विस्तृत होती है
शिक्षा हमारे दिमाग में
लगे ऐसे ही आइनो को खिड़कियों में बदलने का काम करती हैं ,अशिक्षित एवं शिक्षित
व्यक्ति का अंतर तलवार से भी समझा जा सकता है,अशिक्षित व्यक्ति का दिमाग जंग लगी
तलवार की भांति होता है ,जबकि शिक्षित व्यक्ति दिमाग धार लगी तलवार की
भांति होता है ,तलवार में आप जितनी भी धार लगाएंगे वह उतनी ही
ज़्यादा तेज़ होगा इसी आशय में किसी ने सच कहा है
"विद्याविहीन नर पशु समाना " ,तेज़ तलवार और तेज़ बुद्धि
समय आने पर कारगर साबित होती हैं !
वस्तुतः स्कूली
पाठ्य पुस्तकों को पढ़ना ,रटना व पास होना ही शिक्षा नहीं
है, यह शिक्षा मनुष्य को केवल पैसा कमाने वाली मशीन बना सकती है , आदर्श इंसान
नहीं उसी भांति किसी एक धर्म की लकीर पीटने वाली धार्मिक शिक्षा भी मनुष्य
को कट्टर धर्मान्धता की और ले जाती है, उसे संकीर्ण दिमाग तो बनाती
ही है , अपितु उसे उस इश्वर के पास भी नहीं ले जा सकती जिसके
सन्दर्भ में कहा गया है की वह पीड़ितों के अंदर बसता है यह दोनों तरह की शिक्षाएं
संकरी गली में खुलने वाली उस खिड़की के समान है जहाँ स्थाई रूप से बस एक ही चीज़
दिखाई देती है और वह है सामने की दीवार ,जबकि हमें अपनी बुद्धि को ऊँची
अट्टारी पर लगी खिड़की के सामान बनाना चाहिए जहाँ देखने का दायरा बढ़ता है ,सोचने
,समझने, गुणने का दायरा बढ़ता है !!
आज जो यह धर्म के नाम पर
जेहाद चल रहा है , धर्म के नाम पर फसाद चल रहा है, तंग गली में खुलने वाली खिड़की अर्थात संकीर्णता के परिणाम हैं जबकि स्वामी विवेकानंद ने कहा है - "जो बात तुम्हारी तर्क
बुद्धि पर खरी न उतरे उसे यदि ब्रह्मा भी आकर कहें तब भी मत मानो
" धर्म वह नहीं है जो हमारी सोच को संकीर्ण और अपंग बना दे ,बल्कि सच्चा
धर्म वह है जो हमें वास्तव में मानव बना दे
यहीं पर एक सवाल और उठता
है , आर्थिक घोटालेबाज़ तो शिक्षित होते हैं ,बल्कि देश का बंटाधार करने वाले आजकल
बहुत बड़ी संख्या में शिक्षित लोग हो गए हैं ,अपराध के अन्य मार्गों पर
भी काफी शिक्षित लोग आने लगे हैं ,और तो और जवाहर लाल यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित
विश्वविद्यालय के कुछ छात्र तो देश द्रोह तक पर उतारू रहे हैं , देश के कुछ कथित
बुद्धिजीवी एवं कुछ राजनेता 'चढ़ जा बेटा सूली पर, भली करेंगे
भगवान' कहते हुए भले ही उंनकी होंसला अफ़ज़ाई करते रहे,लेकिन आम जनता
ऐसे कृत्यों से घृणा ही करती है और चाहती है के वो सही रास्ते पर
आएं
इन सब कारणों को
मद्देनज़र रखते हुए मेरे दिमाग में एक प्रश्न कौंधा की आखिर शिक्षा का
यह ह्रास क्यों ? प्रतिकूल प्रभाव क्यों ? तभी हमारी खोपड़ी की खिड़की
के कपाट खुले और एक झोके से आईडिया आया की इनलोगों ने महज़ स्कूली
शिक्षा ग्रहण की है ,सांस्कारिक शिक्षा नहीं
इस तरह के
शिक्षितों के बारे में कहा गया है के 'पढ़ तो गया लेकिन गुणा नहीं ' ,पढ़ने और गुणने
में वही अंतर है जो विज्ञानं की शिक्षा में थ्योरी और प्रैक्टिकल
में होता है ,बिना प्रैक्टिकल के थ्योरी पढ़ने से विज्ञानं की शिक्षा निरर्थक
है गुणने के लिए चाहिए नैतिकता का पाठ जिसमें अच्छे संस्कार तथा साहित्यिक
पुस्तकों का महत्वपूर्ण योगदान भी हो !
काश स्कूली शिक्षा
हमारे भेजे में एक मात्र ऐसी खिड़की फिट करती जो सिर्फ सदाचार की तरफ खुलती ! हमें
तो लगता है की शिक्षा मनुष्य के दिमाग में लगे आइनो को हटाकर अनेक खिड़कियां फिट कर
देती है ! जिनमें कुछ डंडी मारने वाले मिलावटखोरों की तरफ खुलती हैं, कोई अपराधियों , नशेड़ियों की तरफ और कुछ खिड़कियां खुलती हैं सदाचार से भरपूर
मंद -सुगंध समीर की तरफ , यह तो हमारे विवेक पर निर्भर करता है की हम
किस तरफ की खिड़की को खोलकर अपने आपको उसमें रंगे ,सराबोर करें ! विवेक
का निर्माण संस्कारों से होता है ,संस्कारों का निर्माण खानदान , सोहबत और
गुणकारी साहित्य से होता है , संस्कारवान ,चरित्रवान लोगों की सोहबत और
गुणकारी साहित्य ही अच्छे व्यक्तियों का निर्माण करते हैं !
पाठशालाओं की शिक्षा यदि
चरित्र निर्माण करती तो रावण जैसा विद्वान् त्रेता युग में राक्षस न होता और ओसामा
या बगदादी जैसे लोग कलियुग में न होते , अतः अंत में यह ही कहूंगा आवश्यकता
है शिक्षा की ,लेकिन वह उन खिड़कियों को खोलने वाली गुणकारी शिक्षा
हो जो देश को नयी ऊंचाइयों तक ले जाये, और यह हो सकता है, होकर रहेगा ,
युवा
जाग चुका है ,मेरा भारत महान अब
सिर्फ एक नारा नहीं रहेगा !
डॉक्टर रंजन तोमर
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